पूजन कृत्यों का उद्देश्य

आप लोग जिस कल्प साधना सत्र में आए हुए हैं, उसमें महत्त्वपूर्ण काम आपको ये करना पड़ रहा है, किसी ऐसी सत्ता के साथ में अपने आप को जोड़ दें, जो बड़ी सामर्थ्यवान है। अकेले आप सीमित हैं। अकेले जो काम कर सकते हैं उससे अपना गुजारा तो हो सकता है लेकिन और ज्यादा ऊँचा उठना अकेले बलबूते पर सम्भव नहीं है। अकेले प्राणियों को भगवान ने इतना दिया है कि जिससे अपना गुजारा कर पायें, हर आदमी को इतनी अकल भी दी है, हाथ-पैर भी दिये हैं, शरीर भी दिया है कि अपना शरीर का गुजारा कर ले और अपनी बच्चों का पालन कर ले, इससे अधिक किसी के पास नहीं है। मनुष्य के पास भी इतना तो हरएक के पास है, प्राणी के पास लेकिन इससे ज्यादा की जरूरत पड़े, तो फिर आपको भगवान का सहारा लेना पड़ेगा। ऐसे शक्तिपुंज (के साथ) सहारा लेना पड़ेगा जिसके साथ शक्तियों के भण्डार भरे पड़े हैं। किसके साथ बने? भगवान के साथ, भगवान कौन? भगवान आप ये मान के चल सकते हैं कि एक बहुत बड़ा (एक) बिजलीघर है, जिसके साथ-साथ में बल्ब लगे रहते हैं, पंखे लगे रहते हैं, छोटी-छोटी मशीनें लगी होती हैं और जनरेटर के साथ में जुड़ जाने की वजह से ये करते रहते हैं। अगर वो जुड़ें नहीं तब - पंखा कैसे चले? बल्ब कैसे जलें? दूसरे काम कैसे बनें? इसीलिए इसको जुड़ जाना आवश्यक है। जुड़े बिना बड़ी शक्ति प्राप्त नहीं हो सकती, बड़े काम सम्भव नहीं हो सकते। मनुष्य बड़े काम करने के लिए किसी बड़ी शक्ति के साथ में जुड़ा रहे ये बहुत जरूरी है। इस जुड़े रहने की प्रक्रिया का नाम है 'उपासना'।

उपासना माने? नजदीक बैठना, पास बैठना। अगर आप पास बैठ जाएँ किसी के, तो उसका गुण, और उसके कर्म, और उसके स्वभाव, और उसकी विशेषताएँ आपके भीतर आना शुरू हो जाएँगी, किसी के साथ बैठ जायें तब। आग की भट्टी के नजदीक अगर आप बैठने लगें तो आपका शरीर गरम हो जाएगा। बरफ की फैक्ट्री के भीतर अगर आप घुस जाएँ तो आपका शरीर ठण्डा होने लगेगा, ऐसी दृष्टि से आपको किसी के साथ में जुड़ना चाहिए। उपासना का अर्थ है पास बैठना। आगे चल करके इसी को जुड़ जाना भी कहते हैं। पास बैठने का उदाहरण आप समझिये, चन्दन के पेड़ के नजदीक बैठते हैं बहुत सारे झाड़-झंकार, उन सारी की सारी झाड़ियों में भी उन्हीं की विशेषता पैदा हो जाती हैं, उपासना हुई नजदीक बैठना हो गया। पारस के नजदीक बैठते हैं, छूता है लोहा, तो लोहा सोना बन जाता है। महान शक्ति के साथ छू करके कौन नहीं बन जाएगा। आप स्वाति के बूँद के बारे में जानते हैं न, स्वाति की बूँद कितनी महान होती है, सीप के मुँह में जा पड़ती है तो मोती पैदा हो जाते हैं। नजदीक न हों तब, तो न आपस में मिलें तब सीप के लिए सम्भव नहीं है कि मोती पैदा कर सके।

यही बात भगवान के सम्बन्ध में भी है। भगवान को कल्पवृक्ष बताया गया है, भगवान को पारस बताया गया है, (भ) भगवान को अमृत बताया गया है। अमृत को छू करके, अमृत को छू करके, अमृत को पी करके आदमी अजर-अमर हो जाते हैं, कल्प वृक्ष के नीचे बैठ करके आदमी अपनी कामना को पूरा कर लेते हैं और पारस को छू करके लोहा सोना हो जाता है। मनुष्य के बारे में भी यही बात है। भगवान को छूए तब, तब फिर सोना हो जाएगा आदमी; फिर लोहे का नहीं रहता, घटिया नहीं रहेगा, बल्कि महान बन जाएगा। ठीक इसी प्रकार से कल्पवृक्ष अर्थात भगवान के नीचे अगर आदमी बैठ जाए तब, तब (वो) उसकी वो कामनाएँ जिनकी वजह से आदमी हर वखत हैरान बना रहता है, उन हैरानियों से छुट्टी पा सकता है और आदमी की कामनाएँ तृप्त हो सकती हैं। मरते तो वो आदमी हैं जो शरीर में जिन्दा रहते हैं, जो अपने आप को आत्मा समझते हैं उनको मरने का सवाल कहाँ? मरेंगे क्यों? मरने की बात क्या हो सकती है, मरने की कोई बात नहीं हो सकती और मरना कभी सम्भव नहीं है। मरना केवल उन्हीं के लिए सम्भव है जो ये विचार करते हैं, कौन सा वाला विचार करते हैं कि हमारा दूर हैं, हम शरीर हैं, और जिस दिन भगवान के नजदीक जा कर के आदमी ये अनुभव कर ले कि हमारा जीवात्मा भगवान का ही एक अंश है - फिर, फिर क्यों मरेगा आदमी? जीवात्मा कहीं मरता है क्या? शरीर तो कपड़ों के तरीके से है रोज बदलते रहते हैं। भय से आदमी की निवृत्ति, मृत्यु के भय से निवृत्ति, कामनाओं की पूर्ति के अभाव में जो आदमी को विक्षोभ उत्पन्न होते हैं उससे निवृत्ति, आदमी को अपनी कुरूपता और कमजोरियों पर जो हैरानी होती रहती है, (उसको) पारस को छू कर के उसकी निवृत्ति। ये अनेक निवृत्तियाँ हो जाती हैं भगवान (को) नजदीक जाने से - इसीलिए उपासना का बहुत महत्त्व बताया गया है। उपासना का अर्थ, उपासना का अर्थ, आप पतंग को देखते हैं न, बच्चे के हाथ में पतंग होती है तो बच्चा झटके से उड़ाता रहता है, ऊपर पतंग चली जाती है। अगर कोई उड़ाने वाला न हो तब, तब पतंग जमीन पर गिरेगी और मटिया मेट हो जाएगी। मनुष्य को अपनी जीवन की पतंग अगर भगवान के हाथ में सुपुर्त कर दे तो फिर जाने कहाँ से कहाँ उड़ता हुआ और उगता हुआ चला जाता है। अगर ये पतंग न करे तब, तब फिर जैसा छोटा और घिनौना मनुष्य है वैसे तो रह जाएगा आगे बढ़ेगा कहाँ? आगे उसकी उन्नति की सम्भावना कहाँ है? उसकी उन्नति के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, कोई सम्भावना नहीं है।

ठीक इसी प्रकार से कठपुतली के बारे में आप जानते हैं न, कठपुतली नाचती है, कैसा सुन्दर तमाशा दिखाती है, बच्चे कितने खुश होते हैं, देखने वालों को कितना अचम्भा होता है। लेकिन क्या कठपुतली अपने आप नाचती है? नहीं कठपुतली अपने आप नहीं नाचती। बाजीगर के हाथ में उसके धागे जुड़े हुए होते हैं और बाजीगर अपनी उँगलियों से घुमाता रहता है। इसका परिणाम, इसका परिणाम ये होता है कि कठपुतली सुन्दर तमाशा दिखा पाती है। अगर ये धागा न बाँधे कठपुतली तब, ये कहे हम तो समर्पित नहीं होते, हम तो इनके अनुशासन नहीं मानेंगे तब कठपुतली का तमाशा दिखाया जाना कैसे सम्भव है? नहीं, कठपुतली का तमाशा दिखाना सम्भव नहीं है। भगवान का उद्यान, भगवान के उद्यान में, अगर हम रहें, तब फिर, तब फिर आप क्या करेंगे, उसी के साथ में लिपट के चलिए, लिपट के चले जाएँगें तो बेल की तरीके से पेड़ होता है और पेड़ के ऊपर बेल लिपटती चली जाती है, उतनी ऊँची हो जाती है जितना कि पेड़। न मिले तब, तब फिर मुश्किल है, तब फिर मुश्किल है। अगर आप उतने लम्बे न हों, कितने? जितना कि बेल। बेल फैल तो सकती है जमीन पर, पर ऊँचा नहीं उठ सकती। ऊँचा उठने के लिए जरूरी है कि बेल किसी पेड़ के साथ में बेल को लपेटने का सौभाग्य मिल जाए। भगवान एक पेड़ के तरीके से है जिसके साथ में अपने आपको आप लपेट देते हैं तब न जाने कहाँ से कहाँ चले जाते हैं।

ऐसा है, ऐसा है ये भगवान। इसके साथ-साथ में क्या करना चाहिए। उपासना में क्या करना होता है, उपासना में नजदीक आते हैं, नजदीक आने के साथ-साथ में सबसे पहला काम सबसे पहला काम करना पड़ता है अपनी सफाई। अपनी सफाई अगर हम कर लें तब, तब फिर सारी गुंजाइश मिलेगी। सफाई न मिले तब फिर मुश्किल है। शीशा है, शीशे को अगर आप मैला-कुचैला रख दें, उस पर अपना चेहरा देखना चाहें तो दिखेगा क्या। न, दिखेगा नहीं। पानी के भीतर आप छाया देखना चाहें, बिन्दु देखना चाहें, तब पानी को साफ होना चाहिए, साफ न बनेगा तो, कैसे बनेगा? इसीलिए भगवान के नजदीक जाने के लिए सबसे पहला काम जो करना पड़ता है, वो अपनी सफाई करनी पड़ती है। अपनी सफाई के लिए जितने भी कृत्य हैं जो प्रारम्भिक धार्मिक कृत्य हैं, आध्यात्मिक कृत्य हैं, उपासनात्मक कृत्य हैं, इन सब में अपने आपकी सफाई, अपना परिष्कार करने की जरूरत पड़ती है।

जैसे, जैसे आप सवेरे बैठते हैं न, पूजा करते हैं तो क्या करते हैं? बताइए। आप क्या करते हैं, आप पंच-कर्म करते हैं चलिए - पवित्रीकरण एक, आचमन दो, प्राणायाम तीन, न्यास चार, शिखा-वन्दन पाँच, ये करते हैं न। अच्छा ये क्या बात है बताइए। पवित्रीकरण में जल हथेली पे ले कर के (श) शरीर पे छिड़कते हैं, और ये भावना करते हैं कि हमारी मलीनताएँ, जो बाहर की (मलीनताएँ) हैं वो दूर हो जाएँ। आचमन तीन बार करते हैं, उसके पीछे क्या संकल्प होता है? उसके पीछे ये संकल्प होता है कि हमारी (मन, वाणी) मन, वचन और कर्म, इन तीनों में (शु) शुद्धता आए। शुद्धता के लिए, इससे नहाने के लिए जल पीते हैं कैसे, जीभ पर जीभ पर भी पीते हैं, इसकी स्वाद इन्द्रियाँ, इसके अन्दर से कटु वचन, वगैरह के जो कषाय-कल्मष हैं, दूर हो जायें, ये आचमन का उद्देश्य है। प्राणायाम - जो साँस हम ग्रहण करते हैं, साँस हमारे अंग-प्रत्यंगों में चली जाती है - उसमें भी हम ये भावना करते हैं, प्राणायाम में, कि भगवान का प्राण ले कर के, भगवान की शक्ति ले कर के, ये हवा हमारे भीतर आए, और धो कर के साफ कर दे। इसी प्रकार से न्यास है, न्यास में पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, कर्मेन्द्रियाँ हैं - इनको हमको (शु) शुद्ध (रहना) चाहिए, अर्थात इनके द्वारा किए हुए कृत्य शुद्ध और पवित्र होने चाहिए - न्यास का यही उद्देश्य है। शिखा-वन्दन - (शिखा का) शिखा का वन्दन, संस्कृति का वन्दन - सिर के ऊपर जो ध्वजा फहरा रखी है, ज्ञान की देवी गायत्री माता की, उसके प्रति अपनी निष्ठा का व्यक्त करना। ये क्या है? ये शिखा-वन्दन है।

ये सारे के सारे कृत्य जो पंच-कर्म कहलाते हैं, ये सिर्फ इस उद्देश्य के लिए हैं कि, साधक को ये मान के चलना चाहिए कि अपने आप को जितना पुनीत और जितना पवित्र बना सकेगा, उतना ही भगवान की किरणें उसके भीतर प्रवेश करेंगी। जितना अपने आपको गन्दा-गलीच बना कर रखेगा उसी हिसाब से व्यवधान उत्पन्न होते चले जाएँगें और जो चीज वो चाहता है उससे वंचित बना रह जाए। आप सामान्य जीवन में देखते हैं न, स्नान किये बिना कहाँ काम चलता है? स्नान न करें तब, स्नान शरीर को नहीं करायें तो मैला-कुचैला जम जाएगा और मैल जम जाने से पसीने के छेद बन्द हो जाएँगें और बीमार पड़ जाएँगें, खाज हो जाएगी, पीलिया हो जाएगा, जुएँ हो जाएँगें, स्नान करना बहुत जरूरी है। जीवन का स्नान करना भी - शरीर का ही नहीं, आत्मा का भी - आत्मा का स्नान कराना, अर्थात आत्मा के ऊपर चढ़ाए हुए कषाए और कल्मषों को हमको दूर करना चाहिए।

जैसे स्नान इसीलिए किया जाता है, यही भजन का भी उद्देश्य है। बुहारी से आप देखते हैं, बुहारी से (बा) बार-बार झाड़ू लगाते हैं - बर्तन माँजते हैं न, रिपिटीशन (repetition) करते हैं - रिपिटीशन (repetition) करना जप करने का उद्देश्य है। एक तरह का साबुन लगाना है, कपड़ा धोते हैं न, कपड़ा धोते हैं तो बार-बार साबुन घिसते हैं, अथवा इसको बार-बार नीचे से ऊपर तक कपड़े को पीटते हैं, दबोचते हैं। इस का अर्थ ये हो गया, जिस तरीके से राम के नाम से मन के ऊपर साबुन के तरीके से धोना शुरू करते हैं तो ये उसका जप का उद्देश्य है। पत्थर पर घिसते हैं बार-बार बार-बार घिस देते हैं न, रिपीट करते हैं, परेशान हो जाता है, अगर नहीं करें तब, तब फिर नहीं होगा। बार-बार करने का मतलब यही है जो बहुत सी चीजें ऐसी होती हैं जिनको रगड़ कर चमका दिया जाता है। चिप्स मारबल को, सिमेंट को बार-बार घिसते रहते हैं और घिसने के बाद में चमक जाता है। किसी भी चीज को बहम करने के लिए उसको घिसाव देना पड़ता है। अपने आपको भी किसी से रगड़ करने के लिए घिसाव देना पड़ता है। घिसाव देने से (हमारे) जो खुरदरापन है, रूखापन है, वो सब चिकनाई में, स्नेह में, सद्भावना में बदल जाता है - ये है रिहर्सल 'जप' का।

जप को आप ये मान के मत चलिए कि भगवान को अपनी खुशामद की जरूरत है, (और) खुशामद जो कोई करता है उससे भगवान प्रसन्न हो जाता है - आप ऐसा कभी ख्याल मत करना। भगवान को न खुशामद कराने की दरकार है, और न कोई शानदार (श) शक्ति खुशामद पसन्द करती है। भगवान की (कौन) खुशामद नहीं करते तो क्या देखभाल नहीं करता? चिड़ियाएँ कहाँ खुशामद करती हैं? जानवर कहाँ उनकी प्रार्थना, पूजा करते हैं? इतने सृष्टि के जीव-जन्तु हैं, इसमें से कौन पूजा, प्रार्थना करता है? तो क्या भगवान ध्यान नहीं रखता? तो क्या भगवान नाराज हो जाता है? क्या जो आदमी जप करेगा उसी से प्रसन्न होगा, जो जप नहीं करेगा उससे प्रसन्न नहीं होगा। नहीं, जप करने का मतलब अगर आपने खुशामद समझा है, तो आप गलती करते हैं। भगवान को न किसी की खुशामद की जरूरत है, न किसी के इनाम, उपहार की जरूरत है। भेंट देंगे, पूजा देंगे, नैवेद्य चढ़ाएँगे, प्रसाद बाटेंगे - आप क्या बच्चों की सी बात करते हैं। क्या करेगा भगवान? फूल भगवान को रिश्वत के रूप में देंगे, आप रिश्वत क्या देंगे? फूल जरूरत पड़ेगी भगवान कहीं से भी, कहीं बगीचे में घुस जाएगा वहीं से फूल सूँघता रहेगा। सारी दुनिया तो उसी की है, जहाँ जरूरत पड़ेगी वहीं से अपनी सुगन्ध ले सकता है, आपके फूलों से क्या बनता बिगड़ता है उसका। इसलिए ये चीजें उपहार देना, ईनाम देना, रिश्वत देना, की दृष्टि से मतलब वस्तु दी जा सकती है उसको, न उसके ऊपर कोई वाणी का असर पड़ता है कोई, प्रार्थना करने का, पूजा करने का, इसका कोई असर नहीं पड़ता।

तब, ये पूजा, उपासना (का इतना) कृत्य जो आप रोज करते हैं, ये किसलिए कराया जाता है? ये वास्तव में अपने मन की धुलाई है। अपने मन की रंगाई है। पहले आप अपने आप को धो के रखेंगे तो (रंगा) रंगना सम्भव हो जाएगा। फिर आप उपासनाएँ जो करेंगे वो सफल हो सकती हैं, साधनाएँ (सा) सार्थक हो सकती हैं। अगर आपने अपनी धुलाई नहीं की है, आपने अपने कषाय-कल्मषों को धोया नहीं है फिर बहुत मुश्किल है, फिर आपके लिए बहुत कठिन हो जाएगा। खेत को अगर आप जोतेंगे नहीं, तो फिर बोने से कैसे फसल पैदा हो जाएगी। ये खेत को राम का नाम जप करना अथवा अन्य किसी तरीके से अपने आप का परिष्कार करना जुताई की तरीके से है। जोत करके खेत आपने ठीक तैयार कर लिया है तो बुवाई में आपको कोई दिक्कत नहीं पड़ेगी। जरा भी दिक्कत नहीं पड़ेगी, बुवाई श्योर हो जाएगी। खेत तो जोता हुआ है, जुता न हो तब, कंकड़ वाला खेत हो तब, सूखा वाला पत्थर वाला खेत हो तब, तब आप जो कुछ भी आप बोएँगे, सब जमीन आपका, बीज भी मारा जाएगा आप फिर निराश होते फिरेंगे। पहले ये दीवार को चुनने से पहले, खड़ी करने से पहले, जमीन खोदनी पड़ती है तब खोद करके उसमें नींव भरनी पड़ती है। अपने आपको जप करना, ध्यान करना, पूजा करना - ये अपने आप की खुदाई करने के बराबर है, ताकि वहाँ राम के नाम की नींव चुनी जा सके। जुताई और बुवाई के तरीके से है, रंगाई और धुलाई के तरीके से है - ये बात समझ में आ जाए, तो फिर आपको उपासना कृत्यों का रहस्य मालूम हो गया, ये समझना चाहिए।

नमन हम करते हैं, वंदन करते हैं, सूर्य नारायण को हम जल चढ़ाते हैं, इसका क्या मतलब है? हम अपने आप को समर्पित करते हैं; अपने छोटे से बर्तन में (र) भरा हुआ जल, हम सूर्य भगवान के सामने चढ़ा देते हैं। इसका अर्थ ये होता है, प्रकारान्तर से, कि (हमा) हमारे शरीर में जो भी जल भरा हुआ है, जीवन रस भरा हुआ है, उसको हम विराट के (तईं), भगवान के तईं समर्पित करते हैं और ये आशा करते हैं कि हमारे जल को एक केन्द्रित न रखा जाए, बल्कि इसको हवा में बखेर दिया जाए, ओस के रूप में, ठंडक के रूप में, नमी के रूप में, ये हमारा छोटा सा जल, जो अर्घ्य के रूप में चढ़ाया गया है, सारे समाज के काम आए, देश के काम आ जाए। ये उद्देश्य, यही उद्देश्य को ले कर के सूर्य अर्घ्य चढ़ाया जाता है। सूर्य अर्घ्य आप पानी पर चढ़ा दिया करें लेकिन उसका भावार्थ नहीं समझें तो फिर केवल क्रिया कृत्य हो जाएगा, फिर एक विडम्बना हो जाएगी, उससे कुछ बनेगा नहीं, उससे नहीं बनेगा। हमको विसर्जन करना होगा - जैसे जल को सूर्य नारायण के सामने विसर्जित कर देते हैं, आपको भी वैसे ही विसर्जित करना पड़ेगा अपने आप को। इसका अर्थ है कि उनका अनुशासन अपने ऊपर धारण करना पड़ेगा।

इष्ट भगवान का स्थापित करते हैं न - इष्ट माने लक्ष्य - हमारा लक्ष्य क्या है? लक्ष्य का मतलब है इष्ट। इष्ट अगर आपने कोई तय कर लिया - (अर्थात) आपका 'शिव' इष्ट है, इसका अर्थ ये हो गया 'कल्याण' आपका इष्ट है। गायत्री अगर आपका इष्ट है तो इसका अर्थ ये हो गया कि आपने शालीनता की देवी का, पुनीत और पवित्रता की देवी का वरण कर दिया, इसके सामने अपने आपको चढ़ाने का निश्चय कर लिया। ये कौन सा, इसी प्रकार से, ये जो है गायत्री, ये प्रज्ञा की देवी, सदाशयता की देवी, शालीनता की देवी - इसके प्रति अगर आपको समर्पित करते हैं, तो आप मान लीजिए कि आपने इष्ट निर्धारित कर लिया। ये प्रतीक हैं, आप वास्तव में सारे के सारे अध्यात्म का अर्थ केवल एक होता है, कि हम भगवान (के) मय हो जाएँ, भगवान में तन्मय हो जाएँ, भगवान (के) साथ ले के चलें। ये (इन्हीं को) इन्हीं को (हमने) पूजा के प्रतीकों के माध्यम से चरितार्थ करते हैं। जल चढ़ाते हैं - भगवान को पानी की जरूरत थोड़े ही है कोई - बल्कि उसका ये अर्थ है कि हम अपने आप को जल जैसा पुनीत, जल जैसा बहने वाला, (ज) (जल जैसे) जल जैसा नम्र बनाते हैं। पुष्प हम भगवान के ऊपर चढ़ाते हैं - उसका अर्थ ये होता है कि हम फूल जैसा जीवन जिएँगे, सुरभित जीवन जिएँगे, समुन्नत जीवन जिएँगे, हँसता और हँसाता हुआ जीवन जिएँगे। फूल चढ़ाने के लिए भगवान को रिश्वत नहीं है वो अपने आप को शिक्षण है - आत्म-शिक्षण के लिए हम फूल चढ़ाते हैं - हमारा फूल जैसा जीवन ही भगवान के चरणों पे चढ़ने का अधिकारी बन सकता है। फूल न हो तब, तब कौन चढ़ायेगा भगवान के चरणों पर, पत्ते भी कोई चढ़ाता है, किसी और चीज को, जड़ को कोई चढ़ाता है नहीं फूल को ही चढ़ाते हैं, इसका अर्थ है भगवान के सिर पर अगर (आपको) विराजमान हैं, भगवान के हृदय (पर) अगर आपको लगना है, भगवान के चरणों (पे) स्थान प्राप्त करना है - उसका फिर (ए) एक ही तरीका रह गया - कौन (से आपको)? कि आप फूल की तरीके से खिलें। फूल की तरीके से खिलें और भगवान के लिए क्या-क्या करना पड़ता है आप जानते हैं, धूप देते हैं, नैवेद्य देते हैं, दीपक जलाते हैं, दीपक से क्या अर्थ होता है? दीपक को आप ये मत सोचिये कि भगवान को कम दिखाई पड़ता है इसलिए आप रोशनी कर देंगे तो उनके रास्ता चलने में सुगमता पड़ेगी, नहीं ऐसा नहीं है। भगवान के लिए कितने दीपक जलते हैं। उनका सूरज (रात में) दिन में देखा है न आपने, रात को चाँद का दीपक देखा है न, भगवान के यहाँ कोई दीपक की कमी नहीं है पर हम भगवान को दीपक नहीं (दिखाते) हैं। दीपक दिखाने का अर्थ केवल अपने आप को ये सिखाने का है, ये आत्म-शिक्षण है कि हमको दीपक की तरीके से जिन्दगी जीनी चाहिए, हमको प्रकाशवान जिन्दगी जीनी चाहिए, हमको शानदार जिन्दगी जीनी चाहिए, हमको अच्छी वाली जिन्दगी जीनी चाहिए।

बस यही तो उद्देश्य है और कोई उद्देश्य नहीं? और कोई उद्देश्य नहीं। इसलिए आपको जो पूजा में वस्तु समर्पित करते हैं उसके पीछे आत्मशिक्षण की जिसका मूल उद्देश्य है आत्म परिष्कार की प्रेरणा ग्रहण करें। नैवेद्य हम ग्रहण करते हैं जिसका अर्थ होता है नैवेद्य एक मिठास को कहते हैं। भगवान कोई चींटी थोड़े ही हैं जो शक्कर तलाश करते फिरे और शक्कर खाने से प्रसन्न हो जाएँ और शक्कर के लिए भागते फिरें। न ऐसा नहीं है, तब क्या है?, नैवेद्य का अर्थ है मिठास - हम अपने आप (को मिठास) (मीठा) मीठा जीवन जिएँ। (हम) हमारे (व्यवहार) में मिठास हो, हमारे में नम्रता हो, सज्जनता हो, दूसरों का सम्मान करना सीखें। ये क्या है? ये ही नैवेद्य हैं। नैवेद्य, आप चावल चढ़ाते हैं भगवान के ऊपर - इसका अर्थ होता है अपनी कमाई का एक (हि) हिस्सा भगवान के तईं, अर्थात श्रेष्ठ कामों के तईं, नियमित रूप से लगाते चलें। इसका अर्थ ये हो गया आपने वो करना शुरू कर दिया, क्या करना शुरू कर दिया? ये भगवान को नैवेद्य चढ़ा दिया, अक्षत चढ़ा दिये, चावल चढ़ा दिये, धूप-दीप चढ़ा दी, बस इन सब का चढ़ाने का मतलब आप फिर भूलना मत। इसमें निषेध का कोई भाव नहीं है, उपहार और ईनाम बाँटने का कोई कोई भाव नहीं है, ऐसा करके हम अपना और भगवान का और उलटा अपमान कर देंगे। हमारी हैसियत कहाँ है कि हम भगवान को खिला पायें, हमारी हैसियत कहाँ है कि हम भगवान को अन्धेरे में से बचा के रोशनी में ला पाएँ। ये तो हम तो अपना शिक्षण करते हैं, तमसो मा ज्योतिर्गमय, हम प्रकाश की ओर चलेंगे अन्धेरे की ओर नहीं, ये शिक्षण करने के लिए हम दीपक जलाते हैं, इन प्रतीकों के बारे में आप ध्यान रखिए।

अगर प्रतीकों के बारे में ध्यान नहीं रखेंगे तब फिर मुश्किल है। अपने आप को तो संशोधन करना ही पड़ेगा। नहीं करेंगे तो मुश्किल पड़ ही जाएगी। आपको उस साधु की कथा याद है जो एक चोर को ये जवाब देता था भगवान को देखना कोई कठिन नहीं है, तो एक दिन चोर ने पूछा तो स्वामीजी हमको दिखा दीजिए। स्वामी जी ने कहा, “अच्छा दिखा देंगे” तो उन्होंने कहा कब दिखा देंगे, उन्होंने कहा जब आप कहेंगे तब ही दिखा देंगे। चोर दूसरे दिन तैयार होकर आ गया सवेरे, उनने कहा हमको दिखाइये भगवान। सन्त ने कहा अच्छा तो फिर चलो, हमारे साथ-साथ चलते हैं और इस पहाड़ के ऊपर टीले पर से दिखा पायेंगे। चलिये। तो उनने कहा देखो भई वहाँ कुछ पूजा-पाठ करना पड़ता है, चार पत्थर लेकर चलना पड़ेगा, चार पत्थर लेकर चलने से ही बात बनेगी, चोर तैयार हो गया। उसने चार सिर के ऊपर पत्थर रख लिये और जब चलने लगा, तो रास्ते में थोड़ी दूर चढ़ा होगा, बहुत थक गया, उसने कहा, स्वामी जी ये बहुत भारी पत्थर हैं हम को बहुत कष्ट होता है। उनने कहा बेटे एक पत्थर फेंक दे, एक पत्थर फेंक दिया। दूसरे पत्थर के साथ चला, फिर थोड़ी देर में थक गया, अरे साहब ये तीन पत्थर हैं और कम कराइये, एक और फेंक दिया। दो पत्थर रह गये, उसको लेकर ऊपर चढ़ने लगा, थोड़ी दूर चढ़ा होगा फिर कहने लगा, साहब ये दो तो बहुत भारी पड़ते हैं एक और फेंक दिया। एक पत्थर और रह गया। उसको ले करके जब ऊपर पहाड़ पर चढ़ता चला जा रहा था तब फिर वो बहुत थक गया। उसने कहा स्वामी जी अब आप ऐसी कृपा करें इस पत्थर को भी फिंकवा दीजिए, तब बात बनेगी। अब तो मुझसे चला भी नहीं जाता है। चार पत्थर लाया, तीन लिये, फिर दो लिए, अब मैं चलते-चलते इतना थक गया हूँ और मेरी गर्दन में दर्द होता है, आप इसको भी फिंकवा दीजिए। अच्छा, बाबाजी ने कहा - अच्छा फेंक दीजिए। चारों पत्थरों को फेंक देने के बाद में चोर जब वहाँ पहुँचा ऊपर टीले पे, तब महात्माजी ने भगवान को दिखाने के बजाय चोर से ये पूछा - चार पत्थर ले करके आप सिर पर चल रहे थे तो आपको टीला चढ़ना मुश्किल था न। अरे साहब, बिल्कुल नहीं हो सकता था, हम जा ही नहीं सकते थे। तब उन्होंने कहा - हमारे ऊपर सिर के ऊपर पत्थर रखे हुए हैं उन पत्थरों को हम ढो कर फेंक दें तो फिर हमारे ऊपर इस टीले पर चढ़ सकना अर्थात भगवान को देख सकना कुछ भी कठिन नहीं रहेगा। काम का पत्थर, क्रोध का पत्थर, लोभ का पत्थर, मोह का पत्थर, मद और मत्सर का पत्थर - ये सारे के सारे पत्थर ऐसे घिनौने पत्थर हैं जो हमारे लिए नाक में दम करते रहते हैं, जो हमको हैरान करते रहते हैं। अगर इन हैरानी को, पत्थरों को हम दूर न करें तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। बस फिर यही शिक्षण है आपको सारी उपासना, आप उद्देश्य बार-बार ध्यान रखिए - इसका एक ही उद्देश्य है कि हम अपने आप को पुनीत बनाएँ, हम धो कर के साफ करें, स्वच्छ करें। दीवाली के दिन घर को साफ करते हैं ताकि लक्ष्मीजी आयें। जब दूल्हा घर में आता है तो, बारात घर में आती है तो धो पौंछ कर साफ करते हैं ताकि सब लोग जो मेहमान आने वाले हैं साफ-सुथरे घर में प्रवेश करना पसन्द करें। आपको यही करना पड़ेगा। उपासना का मतलब नजदीक आना है, नजदीक आने का मतलब अपने आपको पहले धुलाई और सफाई कर देना है। बस आप ये कर पायेंगे समझना चाहिए आपकी बहुत सारी मंजिल पार हो गई, मुझे उम्मीद है आप ऐसा ही करेंगे। समाप्त।

॥ॐ शान्तिः॥

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)